रेयरेस्ट ऑफ रेयर पर हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी: मौत की सजा बदली उम्रकैद में, जानें पूरा फैसला

 बिलासपुर : हाईकोर्ट ने एक बेहद गंभीर आपराधिक मामले में बड़ा फैसला सुनाते हुए मृत्युदंड को उम्रकैद में बदल दिया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि फांसी की सजा केवल “रेयरेस्ट ऑफ रेयर” मामलों में ही दी जा सकती है, और इस केस में यह मानक पूरी तरह लागू नहीं होता।

क्या था मामला: महिला को बहला-फुसलाकर जंगल में दी गई दर्दनाक मौत

यह मामला बेमेतरा से जुड़ा है, जहां 25 वर्षीय महिला, जो परिवार न्यायालय में भृत्य के पद पर कार्यरत थी, 14 अगस्त 2022 को घर से निकली थी और उसके बाद लापता हो गई। अगले दिन उसके पिता ने गुमशुदगी की रिपोर्ट दर्ज कराई थी।

मोबाइल कॉल और CCTV से खुला राज: आरोपी तक पहुंची पुलिस

जांच में सामने आया कि मृतका लगातार आरोपी के संपर्क में थी। मोबाइल कॉल डिटेल, सीसीटीवी फुटेज और इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों के आधार पर पुलिस ने आरोपी की पहचान की। इसके बाद सक्ती जिले के डभरा थाना क्षेत्र के सुखदा गांव निवासी शंकर निषाद को हिरासत में लिया गया।

पुलिस जांच में सामने आई हैरान करने वाली सच्चाई

पूछताछ में आरोपी ने स्वीकार किया कि उसने महिला को फोन कर बुलाया और खरसिया स्टेशन तक ले गया। वहां से उसे सुनसान जंगल की ओर ले जाकर वारदात को अंजाम दिया गया। आरोप है कि उसने पहले महिला के हाथ बांधे और फिर उसके साथ दुष्कर्म किया, इसके बाद ब्लेड से गला और हाथ की नस काटकर हत्या कर दी।

जंगल से मिला शव, कोर्ट ने सुनाई थी फांसी की सजा

पुलिस ने आरोपी के बताए स्थान से शव बरामद किया था और पोस्टमार्टम कराया गया। मामले में ट्रायल कोर्ट ने आरोपी को मृत्युदंड की सजा सुनाई थी। इसके बाद शासन ने सजा की पुष्टि के लिए हाईकोर्ट में मामला भेजा और आरोपी ने भी अपील दायर की।

हाईकोर्ट का अहम फैसला: मौत की सजा नहीं, अब पूरी जिंदगी जेल

मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा और न्यायमूर्ति रविंद्र कुमार अग्रवाल की खंडपीठ ने सुनवाई के बाद कहा कि यह मामला ‘रेयरेस्ट ऑफ रेयर’ श्रेणी में नहीं आता। इसलिए मृत्युदंड उचित नहीं है। अदालत ने फांसी की सजा को बदलकर “आजीवन कारावास” में तब्दील कर दिया और स्पष्ट किया कि दोषी को यह सजा पूरी जिंदगी भुगतनी होगी।

कानूनी संदेश: सख्ती जरूरी, लेकिन सीमा के भीतर

यह फैसला एक बार फिर यह स्पष्ट करता है कि गंभीर अपराधों में भी सजा का निर्धारण कानून के तय मानकों और सिद्धांतों के आधार पर ही होगा। अदालत ने संतुलित दृष्टिकोण अपनाते हुए सख्ती और न्याय के बीच स्पष्ट रेखा खींची है।

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